तो बाबा रामदेव का फुस्स हुआ देसी नारा, अब विदेशी पूंजी से बनाएंगे देशी उत्पाद

 फ़ज़ल इमाम मल्लिक बाबा रामदेव योग गुरु थे. हैं इसलिए नहीं कि अब योग कम करते हैं सामान ज्यादा बेचते हैं. राष्ट्रवाद के नाम पर भी खूब पैसा बटोर रहे हैं. कोई भी ऐसा चैनल नहीं है जिस पर बाबा रामदेव के उत्पादों का विज्ञापन नहीं चलता है. समाचार चैनलों पर भी खूब पैसा लुटाते हैं. विज्ञापन इतना देते हैं कि कोई समाचार चैनल इनके किसी उत्पाद के खिलाफ कोई खबर नहीं चलाता. बाब रामदेव के खिलाफ तो नहीं ही चलाता है. लेकिन बाबा रामदेव कुछ बोलते हैं तो खबर बन जाती है. यह अलग बात है कि उसमें खबर रहे या न रहे. लेकिन चैनलों की अपनी पालिसी होती है. उसमें बाबा रामदेव इसलिए फिट बैठते हैं क्योंकि वे हर साल करोड़ों का विज्ञापन चैनलों पर लुटाते हैं. मंत्रियों-संतरियों के यहां थोक के भाव में उनके उत्पाद जाते हैं. हरिद्वार में सरकार के लोगों के लिए उनके आश्रम के दरवाजे पहले भी खुले रहते थे, अब भी खुले रहते हैं. बाबा रामदेव के आश्रम में पीडित सियासतदां पहुंचते हैं और हफ्तों योग कर उपचार कराते हैं. यह अच्छी बात है. परोपकार तो करनी ही चाहिए. बाबा रामदेव विज्ञापनों में इसकी बात भी करते हैं. लेकिन गरीबों का परोपकार कम होता है, अमीरों का ज्यादा. उत्पाद बनाते हैं तो उसे बेचने के लिए मुनाफा भी चाहिए. दूसरी कंपनियों की तरह उनके उत्पाद की कीमतें भी लगातार बढ़ रही हैं और किसी-किसी उत्पाद की तो दोगुनी भी. लेकिन बाबा रामदेव करते हैं कि बहुत कम मुनाफा लिया जाता है. वैसे उनके उत्पादों पर सवाल भी खड़े हुए हैं. बाबा रामदेव के कई उत्पाद गुणवत्ता की कसौटी पर खरे नहीं उतरे. सेना की कैंटीन ने तो आंवला जूस बेचने पर पाबंदी भी लगा दी थी. पतंजलि को भ्रामक प्रचार के पांच मामलों में दोषी पाया गया. एडीएम हरिद्वार ने पतंजलि आयुर्वेद की पांच उत्पादन यूनिटों पर ग्यारह लाख का जुर्माना भी लगाया. लेकिन फिर भी बाबा बमबम हैं और चैनल खामोश तो इसकी वजह उन्हें दिया जाने वाला विज्ञापन ही है. बाबा रामदेव देसी की वकालत करते हैं. विदेशी कंपनियों के खिलाफ जम कर आवाज उठाते हैं. यह बात दीगर है कि सरकार ने रिटेल क्षेत्र में एफडीआई के दरवाजे खोल डाले हैं. लेकिन बाबा रामदेव चुप हैं. क्यों चुप हैं यह तो बाबा रामदेव ही बेहतर बता सकते हैं. बाबा देसी राग गाते हैं और सरकार विदेशी राग अलापती है. लेकिन बाबा राम देशी राग पर ही जमे रहे. लेकिन अब बाबा रामदेव की कंपनी में फ्रांसीसी कंपनी एलएमवीएच मोनेट हेनेसी-लुई वयुईट्टन ने करीब पांच सौल मीलिन डालर के निवेश की इच्छा जताई है. कंपनी निवेश के जरिए पतंजलि में हिस्सेदारी चाह रही है. लेकिन पतंजलि के प्रवक्ता प्रवक्ता एसके गुप्ता तिजारावाला ने ट्वीट के जरिए इसकी पुष्टि तो की है लेकिन यह भी कहा कि आचार्य बालकृष्ण का कहना है कि विदेशी तकनीक का इस्तेमाल प्रगति के लिए करते हैं वैसें राष्ट्रहित में विदेशी पूंजी से परहेज नहीं करेंगे. लेकिन पैसा हम अपनी शर्तों पर लेंगे, शेयर या उसमें हिस्सेदारी नहीं देंगे. हालांकि बालकृष्ण की इन बातों पर यकीन करना मुश्किल है. जो कंपनी पैसा लगाएगी वह अपनी शर्तों पर लगाएगी. ऐसा ही होता रहा है. हिस्सेदारी दें या नहीं लेकिन मुनाफा तो कंपनी लेगी ही या फिर कर्ज भी लेगी तो सूद देना ही पड़ेगा. बालकृष्ण का कहना है कि है कि पांच हजार करोड़ की रकम कर्ज लेना चाहते हैं. दरअसल पतंजलि को नागपुर, ग्रेटर नोएडा, छत्तीसगढ़, असम सहित कुछ दूसरे राज्यों में अपना प्लांट लगाना है. पतंजलि पिछले कुछ सालों में देश की बड़ी एफएमसीजी कंपनी बन गई है. उसने हिंदुस्तान यूनिलीवर, कोलगेट पामोलिव और डाबर जैसी ग्लोबल और लोकल कंपनियों को अपने आयुर्वेदिक प्रॉडक्ट पोर्टफोलियो को विस्तार देने पर मजबूर किया है. लेकिन देशी की वकालत करने वाले बाबा रामदेव विदेशी कंपनी के साथ जाते हैं तो इससे उनकी उस छवि को धक्का लगेगा, जिसकी वजह से वे लोगों में जाने जाते हैं.

News Posted on: 12-01-2018
वीडियो न्यूज़