मोदी का कारनामा,यादवी राजनीति को दिया झटका,मुलायम,शरद,लालू के उड़ा दिए तोते,बीजेपी के यादव नेता भी सरकार में हाशिये पर

मुसलमानो के वोट लेकर उनसे कन्नी काट कर सत्ता की मलाई काटने वाला यादव समाज परेशान हॉल अब कोई नहीं पुरसाने हाल 

नई दिल्ली- मुलायम को बेटे अखिलेश से बगावत कर किनारे लगाना ,शरद यादव का राजयसभा छिनना और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को हुई सजा  यादवी राजनीति के लिए भी 2019 के लिए बड़ा झटका है। लालू के जेल जाने के साथ ही हिन्दी भाषी राज्यों में बीते करीब तीन दशक से यादव राजनीति के तीनों मुखर चेहरे सियासी हाशिये पर पहुंच गये हैं। 

समाजवादी विचारधारा के लिए बड़ा नुकसान

अकेले बिहार और उत्तरप्रदेश की 120 लोकसभा सीटों में से एक वक्त आधी सीटें अपनी झोली में रखने वाले यदुवंशी राजनीतिक के चेहरे लालू और मुलायम के साथ शरद की सियासी कमजोरी जाहिर तौर पर समाजवादी विचाराधारा वाले दलों के लिए भी बड़ा नुकसान है। चारा घोटाले में दोषी ठहराये जाने के बाद चुनाव लड़ने की पाबंदी झेल रहे लालू ने तेजस्वी यादव को अपना उत्तराधिकारी भले ही बना दिया हो। मगर चाहे राजद हो या फिर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति का मंच तेजस्वी अभी लालू की जगह की भरपाई नहीं कर सकते। भाजपा के खिलाफ सेक्यूलर राजनीति का सबसे मुखर चेहरा रहे लालू की राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति में अब तक खास भूमिका रही थी। पिता की सियासी विरासत को बचाने की बड़ी चुनौती का सामना कर रहे तेजस्वी फिलहाल लालू के कद से मीलों दूर हैं।

जब बेटे अखिलेश की बगावत के सामने मुलायम ने किया समर्पण

इसी तरह उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव अपने बेटे अखिलेश यादव की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के सामने पहले ही समर्पण कर चुके हैं। राष्ट्रीय राजनीति के मंचों से भी मुलायम धीरे-धीरे ओझल हो रहे हैं। 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा को 35 सीटें दिलाकर मुलायम ने जहां अपने राजनीतिक वर्चस्व का परचम लहराया था और उपचुनाव के जरिये यह आंकड़ा 38 तक पहुंचाया था। जबकि लालू ने बिहार की 40 में से 22 सीटों के साथ झारखंड से भी 2 सीटें यानी कुल 24 लोकसभा सीट हासिल कर यूपीए की बनी पहली सरकार में अपना वर्चस्व बनाया।
मुलायम भी यूपीए के समर्थकों में शामिल रहे और अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील को मुकाम पर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। 2009 के लोकसभा चुनाव में लालू को ज्यादा कामयाबी तो नहीं मिली मगर सियासी रुतबा कम नहीं हुआ। सपा भी घटी फिर भी उसे 23 लोकसभा सीटें जीतने में सफलता हासिल हुई। मगर राष्ट्रीय राजनीति की मुख्यधारा से आज ये दोनों यदुवंशी नेता बाहर हो गए हैं।

जब केंद्र की सियासत में लालू का था दबदबा

1990 में एक ही समय उत्तरप्रदेश और बिहार के मुख्यमंत्री के रुप में सियासत में उभरे मुलायम और लालू का अपने सूबों के साथ केंद्रीय राजनीति में खासा असर रहा था। वीपी सिंह की केंद्र सरकार के बाद देवेगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल की अगुआई में 1996 और 1997 में बनी सरकारों में भी इन दोनों की बड़ी भूमिका थी। जनता परिवार में तब मुलायम और लालू दोनों पीएम पद तक के दावेदार रहे थे। देवेगौड़ा को जब पीएम चुना गया था तब पार्टी की उस बैठक में लालू की इस पर जताई गई नाराजगी की चर्चाएं भी सियासी इतिहास का हिस्सा है।

जब मुलायम ने सोनिया को पीएम बनने से रोका

पिछड़े वर्ग की राजनीति के इन दोनों चैंपियनों के उस दौर की सियासी ताकत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि 1999 में 13 महीने की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार गिरने के बाद यह मुलायम सिंह यादव ही थे जिन्होंने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था। मुलायम ने पहले सोनिया को समर्थन का भरोसा दे दिया। सोनिया ने जब राष्ट्रपति से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया तो मुलायम ने अपने 20 सांसदों के समर्थन की चिठ्ठी कांग्रेस को नहीं दी और लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में वाजपेयी सरकार बहुमत के साथ सत्ता में लौटी। मुलायम को बाद में इसकी राजनीति कीमत भी चुकानी पड़ी। माना जाता है कि 38 लोकसभा सीट के साथ यूपीए वन सरकार को समर्थन देने के बाद भी मुलायम को इसी घटना की वजह से सरकार में शामिल नहीं किया गया था। अखिलेश सपा में उनके उत्तराधिकारी तो बन गये हैं मगर राष्ट्रीय क्षितिज पर अभी मुलायम की सियासी टोपी की उंचाई उनसे बहुत दूर है।

शरद यादव, न जनाधार न संसद के सदस्य

इन दोनों के बाद यदुवंशी राजनीति के तीसरे बड़े चेहरे शरद यादव माने जाते रहे हैं। मगर अब न उनके पास जनाधार वाली पार्टी बची है और न संसद की सदस्यता। जदयू जब पहले दौर में एनडीए का डेढ दशक से ज्यादा तक साझीदार रहा था तब शरद पार्टी में लालू और मुलायम के प्रभाव को थामने वाले एनडीए के यादवी चेहरा हुआ करते था। 
जबकि बिहार में महागठबंधन का हिस्सा बनने के बाद वे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति को गोलबंद करने में खास भूमिका निभा रहे थे। मगर इस समय शरद खुद अपने राजनीतिक वजूद के लिए संघर्ष करते दिख रहे हैं।
हालत ऐसी ही रही तो मतलब परस्त यादव राजनीति अब उभर नहीं पायेंगी।ऐसा  लोगो का खासकर मुसलमानो का कहना हैं 

News Posted on: 08-01-2018
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