जिसकी आँखों में कटी थी सदियाँ, उसने सदियों की जुदाई दी है।हाये शशांक सर ,कल होगा अंतिम संस्कार

मोहब्बत और मौत दोनों बिन बुलाए मेहमान होते है कब आजाए कोई नहीं जानता  लेकिन दोनों का एक ही काम है एक को दिल चाहिए दुसरी को धड़कन !!

हाये अफ़सोस वरिष्ठ पत्रकार शेखर त्रिपाठी का रविवार को गाजियाबाद में दुखद निधन हो गया। श्री त्रिपाठी 56 वर्ष के थे और उनका विगत कुछ दिनों से स्थानीय यशोदा अस्पताल में इलाज चल रहा था। उनका अंतिम संस्कार सोमवार, 25 दिसंबर को दिल्ली में यमुना तट स्थित निगम बोध घाट पर मध्याह्न 12बजे होगा। मूल रूप से कानपुर के निवासी शशांक शेखर त्रिपाठी लगभग तीन दशक तक हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय रहे और सदैव तथ्य व सत्य के अन्वेषी रहे। उन्होंने कानपुर, लखनऊ, वाराणसी और दिल्ली में दैनिक जागरण सहित कई पत्रकारीय प्रतिष्ठानों में योगदान किया। उनका प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और डिजिटल मीडिया आदि समस्त पत्रकारीय विधाओं में समान अधिकार था। उनके शोकाकुल परिवार में माँ, पत्नी और दो पुत्र हैं। शेखर जी के निधन से समस्त पत्रकारिता जगत शोकाकुल है। 

Onkareshwar Pandey : वरिष्ठ पत्रकार शशांक शेखर त्रिपाठी का असमय चले जाना कचोट रहा है। साथियों ने खबर दी है कि वे गुरुवार को लखनऊ मे अपने घर के बाथरूम में फिसलकर गिर गए थे। अस्पताल में तीन दिनों तक मौत से जंग लड़ने के बाद आखिरकार वे उस सफर पर चल पड़े, जहाँ से कोई वापस नहीं आता। हिंदी पट्टी के प्रखर पत्रकार शेखर त्रिपाठी दैनिक जागरण के संपादक थे। वे राष्ट्रीय सहारा दिल्ली और अन्य कई अखबारों में भी रहे। मेरे अच्छे मित्र थे। बेहतरीन इंसान। मुश्किलों में दोस्तों की आगे बढ़ कर मदद करने वाले । ईश्वर उनकी आत्मा को शांति और मोक्ष प्रदान करें और उनके परिवार को यह दुख सहने की शक्ति।

Zafar Irshad : दैनिक जागरण के पूर्व संपादक शशांक शेखर त्रिपाठी जी नही रहे.यारों के यार हमेशा मुस्कुराते रहने वाले.एक बार उनके ऑफिस पहुंचा मैं उनसे मिलने शाम को..उन्होंने मेरी गाड़ी अपने ऑफिस में खड़ी करवाई और अपनी कार से लेकर निकल पड़े लखनऊ की सड़कों पर, रात भर खूब खिलाया पिलाया..2 बजे मुझे छोड़ा फिर सुबह 5 बजे मैं कानपुर वापिस गया..बहुत याद आएंगे त्रिपाठी सर जी. Love you हमेशा..

Hafeez Kidwai :  कितना आसान है RIP लिखना,कितना मुश्किल है किसी के न होने को बर्दाश्त करना।क़ाबिल और मशहूर सम्पादक शशांक शेखर त्रिपाठी टहलते घूमते चले गए।उर्दू पर उनसे वह बहस और इंक़िलाब अख़बार में मेरे न जाने की उनकी ख़ुशी, दोनों मनो मिटटी में दब चुकी है। आज जब उनके न रहने का दुःखद समाचार मिला,लगा की दूर कहीं घूमने ही तो गए होंगे,लौटेंगे तो मिलेंगे वरना जहाँ होंगे जाकर मिल लिया जाएगा। अब ज़्यादातर लोग साथ के जा ही तो रहें हैं।उम्र नही बल्कि मिजाज़ की वजह से साथ के लोग।परसों जोशी जी और आज त्रिपाठी भाई इनकी क्या क्या बातें याद करें।बस इतना ही की आज आप जहाँ हैं कल वहीं आकर मिलते हैं, वहाँ का आप बताइयेगा,यहाँ का हम बताएँगे....बेचैनी है, बेहद

Utkarsh Sinha : शेखर सर, यानी शशांक शेखर त्रिपाठी । हिंदी पत्रकारिता में सीखाने वाले कुछ चुनिंदा लोगो में से एक थे। अनुजवत स्नेह मिला आपसे । स्मृतियां हमेशा जिंदा रहेंगी सर। श्रद्धांजलि...

वरिष्ठ पत्रकार ओंकारेश्वर पांडेय, ज़फर इरशाद, हफीज किदवई और उत्कर्ष सिन्हा की एफबी वॉल से

News Posted on: 24-12-2017
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