जनसंघी की बनायीं मस्जिद में पड़ते हैं नमाज़ अबू धाबी के मुसलमान

डॉक्टर बी आर शेट्टी, अमीरात में पांच सब से धनी भारतीयों में से एक
"मैं जनसंघी हूँ. आप ने मेरे जनसंघ बैकग्राउंड के बारे में पूछा ही नहीं". ये शब्द थे अबू धाबी में प्रवासी भारतीय डॉक्टर बी आर शेट्टी के. इससे पहले कि मैं उनके जनसंघ लिंक के बारे में पूछता वो इंटरव्यू के दौरान खुद ही बोल पड़े.
अरबों डॉलर के मालिक डॉक्टर शेट्टी एक जनसंघी तो हैं लेकिन खुले ज़ेहन के. वो शायद ऐसे पहले जनसंघी होंगे जिन्होंने मुसलमानों के लिए एक मस्जिद बनवायी हो. अबू धाबी में उनके अस्पताल में बनी ये मस्जिद छोटी सी है लेकिन सुन्दर है.
दुबई को आकार देते भारतीयों की कहानी
दुबई में पहले से ही दो मंदिर हैं
शेट्टी उस समिति के अध्यक्ष भी हैं जो अबू धाबी में पहले हिन्दू मंदिर के निर्माण के लिए ज़िम्मेदार है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2015 में अमीरात का दौरा किया था. उस समय मंदिर के लिए अबू धाबी सरकार ने ज़मीन देने का एलान किया था. मंदिर पर काम अगले साल फ़रवरी में शुरू करने की योजना है. ये सारी ज़िम्मेदारी शेट्टी के कन्धों पर है. वैसे दुबई में पहले से ही दो मंदिर हैं और एक गुरुद्वारा.
हज़ारों प्रवासी भारतीयों ने अमीरात में मोदी का स्वागत किया था. स्वागत के इस कार्यक्रम को अंजाम देने वाले कोई और नहीं डॉक्टर शेट्टी ही थे.
शेट्टी अमीरात में पांच सबसे धनी भारतीयों में से एक हैं. वो अमीरात में स्वास्थ्य सेवाओं की सब से बड़ी कंपनी न्यू मेडिकल सेंटर (एनएमसी) के मालिक हैं जिसके इस देश में दर्जनों अस्पताल और क्लिनिक हैं. यूऐइ एक्सचेंज नाम की मनी ट्रांसफर कंपनी के भी वो मालिक हैं. इसके अलावा उन्होंने 2014 में विदेशी मुद्रा कंपनी "ट्रैवेक्स" को खरीद लिया जिसकी 27 देशों में शाखाएं हैं.
शेट्टी ने मुसलमानों के लिए ये मस्जिद बनवायी
डॉक्टर शेट्टी की आपबीती रंक से राजा बनने की कहानी है. वो कर्नाटक के उडुपी में 1942 में पैदा हुए और वहीं उनकी पढ़ाई हुई. पॉकेट में कुछ पैसे लेकर वो 1973 में अपनी क़िस्मत आज़माने दुबई पहुंचे. तब उनके पास कोई नौकरी भी नहीं थी.
वो उन बीते दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "मैं ने क़र्ज़ लिया और चंद डॉलर के साथ यहाँ आया. ओपन (OPEN) वीज़ा लेकर आया, कोई नौकरी नहीं. उस समय मुझे कहीं नौकरी नहीं मिली. मुझे हर हाल में काम करना था. घर की ज़िम्मेदारियाँ थीं. तो इसीलिए मैं वापस नहीं लौटा."
घर-घर जाकर दवा बेचने से की शुरुआत
नौकरी न मिलने के बावजूद उन्हों ने हिम्मत नहीं हारी. वो भारत से फ़ार्मासिस्ट की डिग्री लेकर दुबई आये थे. ये पढ़ाई उनके काम आयी. "मैंने सेल्ज़मैन की नौकरी की. घर-घर जाकर दवाई बेचनी शुरू की. डॉक्टरों के पास सैंपल लेकर गया और इस तरह संयुक्त अरब अमीरात का मैं पहला मेडिकल रेप्रेज़ेंटेटिव बन गया."
धीरे धीरे अमीरात में उनके क़दम जमने लगे और कामयाबियों की सीढ़यां चढ़ते रहे. भारतीयों को अपने परिवार वालों को पैसे भेजने में दिक़्क़त होती है. तो उन्होंने 1980 में यूएई एक्सचेंज की स्थापना की. अब यह एक बड़ी कंपनी बन गयी है. वो कहते हैं, "पूरे भारत में और इसके इलावा फिलीपीन्स श्रीलंका समेत 24 देशों में हम पैसे भेज रहे हैं जिसकी पूरी राशि 8 अरब डॉलर सालाना है."
एपीजे अब्दुल कलाम ने किया शेट्टी की कंपनी का उद्घाटन
लेकिन क्या इंटरनेट और स्मार्टफ़ोन के ज़माने में किसी को यहाँ से घर पैसे भेजने के लिए उनकी कंपनी की ज़रूरत पड़ेगी? शेट्टी के अनुसार इससे उनकी कंपनी को फायदा हुआ है नुकसान नहीं, "(मोबाइल) ऐप के कारण मुझे अब नयी शाखा खोलने में पैसे नहीं खर्च करने पड़ते हैं, कर्मचारियों की तनख्वाहों के पैसे बचते हैं. अब आप अपने फ़ोन के ऐप से पैसे घर भेज सकते हैं और आपके देश में ये पैसा सीधे आपके अकाउंट में तुरंत चला जाएगा. इससे हमारे बिज़नेस को बढ़ोतरी मिली है."
शेट्टी ने 2003 में फार्मास्युटिकल निर्माता एनएमसी न्यूफोर्मा की स्थापना की जिसका उद्धघाटन भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने किया था. इन्होंने 2014 में विदेशी मुद्रा कंपनी "ट्रैवेक्स" को खरीद लिया. आज वो एक अन्दाज़े के मुताबिक़ लगभग 4 अरब डॉलर के व्यासाय के मालिक हैं.
एक बेरोज़गार युवा से एक अरबपति बनने का राज़ क्या है? "मेरी कामयाबी का सबसे बड़ा राज़ है शेख ज़ायेद (ज़ायेद बिन सुल्तान अल नाहयान अमीरात के संस्थापक और इसके रईस) की सलाह: गुणवत्ता और सामर्थ्य. मैं उसमें नैतिकता जोड़ता हूं."
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रहने के लिए ये सबसे अच्छा देश
शायद इसी लिए उन्हें शेख ज़ायेद के अमीरात से गहरा लगाव है. इस देश की वो तारीफ़ करते नहीं थकते."मैं आपसे बेहद ख़ुशी के साथ कहना चाहता हूँ कि ये रहने के लिए सबसे अच्छा देश है. मैं यहाँ सही समय पर आया. अल्लाह मुझे लेकर यहाँ आया."
ज़ाहिर है अमीरात से बेहद प्यार कारण ये भी है कि इस देश ने शेट्टी को सब कुछ दिया. वो कहते हैं कि अगर वो भारत में रह जाते तो इतनी कामयाबी उन्हें नहीं मिलती.
"मेरी दो माताएं हैं"
तो क्या उन्हें अपने देश भारत से लगाव नहीं? वो फ़ौरन इसका जवाब यूँ देते हैं, "मैं हमेशा कहता हूँ मेरी दो माताएं हैं- एक अपनी मातृभूमि (भारत) और एक ये माँ (अमीरात) जिसने मेरी देखभाल की. मैं पूरी तरह से इस देश के लिए प्रतिबद्ध हूँ. साथ ही अपने देश के लिए भी प्रतिबद्ध हूँ."
शेट्टी के तीन बच्चे हैं लेकिन उनके अनुसार वो अपने पैरों पर खुद खड़े हुए हैं. तो इनका इतना बड़ा व्यापार साम्राज्य बच्चों को विरासत में नहीं मिलेगा? जवाब आया नहीं. शेट्टी एक ट्रस्ट बनाना चाहते हैं जो उनके जाने के बाद उनके व्यापार को चलाएगा.

News Posted on: 20-12-2017
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