एक बिहारी सब पर भारी,प्याज़ और रामबिलास पासवान दोने निकाल रहे देश वासियों से आँसूओ के बीच आह

महंगाई डायन खाए जा रही है. प्याज रुला रहा तो टमाटर रसोई से गायब है. गैस सिलेंडर की कीमत करीब सौ रुपए बढ़ गई है. कीमतों में लगातार इजाफा हो रहा है लेकिन सरकार सोई है और लोग राग देशभक्ति में डूबे हुए. लेकिन चैनलों से महंगाई गायब है. बहस के केंद्र में हिंदू-मुसलमान हैं या मस्जिद-मंदिर. मीडिया के लिए महंगाई कोई मुद्दा नहीं है. जन सरोकारों से मीडिया का कट जाना चिंता का सबब है. हालांकि वे कहते जरूर हैं कि वे दिए के साथ हैं लेकिन दरअसल देश का मीडिया आज हवा के साथ है. इसलिए महंगाई मीडिया की चर्चा से गायब है.

मीडिया की इस भूमिका पर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने भी चिंता जताई है. उन्होंने बढ़ती महंगाई के लिए केंद्र सरकार पर तो निशाना साधा ही, मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाया. सोशल मीडिया पर लालू यादव ने लिखा है कि देश के गरीब लोग न तो राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं न ही टीवी चैनलों का टीआरपी बढ़ाते हैं. शायद यही वजह है कि महंगाई जैसे मुद्दे पर कहीं कोई सवाल खड़े नहीं कर रहा है. लालू ने ट्वीट कर कहा, पेट्रोल-80 रुपए, टमाटर-80 रुपए, प्याज -80 रुपए। न ग़रीब चंदा देता है, न टीआरपी! तो महँगाई पर बात कौन करेगा. करेगा वह जातिवादी और भ्रष्टाचारी कहलाएगा. लालू भले अपने बड़बोलेपन के लिए जाने जाते हैं लेकिन महंगाई और मीडिया को लेकर उनका सवाल वाजिब है.

देश में जिस तेजी से महंगाई पांव पसार रही है उस पर चर्चा होनी चाहिए. सरकार को भी चिंता करनी होगी. लेकिन केंद्र सरकार के मंत्री इस मुद्दे पर पल्ला झाड़ लेते हैं. प्याज की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. लेकिन कीमतों पर लगाम लगाने में केंद्र सरकार बेबस है. सरकार रटा-रटाया जवाब दे रही है, उत्पादन में कमी की वजह से कीमतें बेतहाशा बढ़ी हैं. केंद्रीय खाद्य व उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने तो हाथ खड़े कर दिए. प्याज लोगों को रुलाता रहे. सरकार कुछ नहीं कर सकती. पासवान की मानें तो प्याज का रकबा 2016-17 के 2.65 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस साल घटकर 1.90 लाख हेक्टेयर रह गया है. हालांकि पासवान कहते हैं कि सरकार ने कई कदम उठाए. नासिक और अलवर में सरकार ने प्याज खरीदे हैं. प्याज का आयात भी किया गया है लेकिन कीमतें कम नहीं हो रहीं हैं. यह हमारे हाथ में नहीं है. हम कीमतें कम नहीं कर सकते. ऐसे में सरकार से क्या उम्मीद रखें.

सवाल यह भी है कि क्या सचमुच प्याज की महंगाई किसी आपदा की देन है जिसे नियति मान कर चुप बैठ जाया जाए. पासवान के बयान से तो ऐसा ही लगता है. सरकार के एक मंत्री की बेबसी और लाचारी देखी जा सकती है. हम विकास के दावे कर रहें. आसमान में कुलांचे भर रहे हैं लेकिन लोगों के घरों तक प्याज नहीं पहुंचा पा रहे हैं. सच्चाई यह है.

हालांकि वे पुरउम्मीद जरूर हैं. पासवान का मानना है कि प्याज के फसलों की आवाक शुरू होने पर कीमतों में कमी होगी. उन्होंने जमाखोरी को भी कीमतों में बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार ठहराया लेकिन वे यह नहीं बता पाए कि उनके खिलाफ सरकार कार्रवाई क्यों नहीं कर पा रही है. पासवान की बात मान लें कि प्याज की खेती का रकबा घट गया है तो यह और भी चिंता में डालने वाली बात है. सरकार से पूछा जाना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है. लेकिन सवाल कौन करे. सरकार के लिए खेती-किसानी कोई मुद्दा नहीं है. कीमतें बढ़ रहीं हैं बढ़ें. सब कुछ राम भरोसे है. सरकार भी, देश भी.

News Posted on: 02-12-2017
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