वाह रे कश्मीरी लानत पीटे मुसलमान शबे क़द्र २७ रमजान को मस्जिद के बाहर मुस्लिम DSP को पीट-पीटकर मार डाला,मोदी और उनकी महबूबा तुम यज़ीदी मुसलमानो माफ़ कर दे,लेकिन अल्लाह नहीं माफ़  करेगा क़ातिलों तुमको.......


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अखिलेश का एक मंत्री चाय पिलाने के लिए खुद भैंस दुहता है

बहराइच-बहराइच में दरगाह है. सैयद सालार मसूद गाजी की. कहते हैं कि अफगानिस्तान के महमूद गजनवी का भांजा गाजी लड़ाइयां लड़ते हुए, यहां तक आया थे . गाजी के नाम पर दरगाह कब बनी, क्यों बनी, इससे किसी को मतलब नहीं है. दरगाह पर हिंदू-मुस्लिम समान आस्था से आते हैं. आस्था से ज्यादा वो उस मेले के चलते आते हैं, जो साल भर में एक बार ठेठ जेठ की गरमी में एक महीने तक चलता है. इसमें बहुत दूर-दूर से लोग आते हैं
इतनी भीड़ होती है कि हर बार मेला खत्म होने के बाद महीनों तक स्थानीय लोग शिकायत करते हैं कि मेले की वजह से रिक्शे वालों ने दाम दोगुने कर दिए हैं. ये अलग बात है कि करीब एक किलोमीटर की दूरी का रिक्शावाले 10 रुपया लेते हैं. दरगाह के मेले में पहले कई सर्कस आते थे. पाबंदियों के चलते अब सर्कस बंद हो गए. कई जादूगर आते हैं, जो अनहोनी को होता दिखाते हैं, जो लोगों को काफी पसंद आता है.
बहराइच सदर से 5 बार से विधायक होते रहे हैं डॉक्टर वकार अहमद शाह. 1993 में पहली बार सपा से लड़े और तभी से ये सीट हर बार सपा के खाते में आती रही. वकार अहमद शाह विधानसभा के उपाध्यक्ष और कार्यवाहक अध्यक्ष रह चुके हैं. वकार अहमद शाह बीमार हैं, कोमा तो नहीं, लेकिन कोमा में होने जैसी हालत में हैं. उनकी पत्नी रूबाब सईदा सांसद रह चुकी हैं. इस बार बहराइच सदर से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं और बेटा यासिर शाह मंत्री भी हैं जो  जिले की एक दूसरी सीट मटेरा से चुनाव लड़ रहा है.
बहराइच पिछले कई सालों में कितना बदला है? शहर में पहली फ्लेक्स मशीन लगाने का दावा करने वाली दुकान पर, जिसने सालों पहले और सालों तक मंदिरा बेदी का बहुत बड़ा फ्लेक्स लगाए रखा, अब तमन्ना का फ्लेक्स लगा है. एक दुकान पर करेंसी एक्सचेंज की बाबत लिखा है और वहां केवल चार मुद्राएं लिखी हैं. पहले, दूसरे, तीसरे नंबर पर रियाल, दीनार, दिरहम और चौथे नंबर पर डॉलर लिखा है. एक और दुकान जो रेल टिकट के साथ हवाई टिकट भी करती है, उसके बोर्ड पर जो हवाई जहाज बना है, उस पर सऊदी अरब लिखा है.
शहर में ऑटो और ई-रिक्शा भी चलने लगे हैं. पीपल चौराहे और घंटाघर के बीच जाम बढ़ता जा रहा है. एक डीएम ने सड़क के दोनों ओर दुकानों के सामने खड़ी होने वाली मोटरसाइकिलों को सड़क के बीच तिरछे खड़ा करने की व्यवस्था शुरू की थी, ताकि वो कम जगह घेरें और डिवाइडर का भी काम करें, शायद उन डीएम के जाने के बाद वो व्यवस्था खत्म हो गई. घंटाघर की घड़ी अब भी नहीं चल रही है.
घंटाघर के पास बनी जिस मजार को बहुत से स्थानीय लोग गाजी के घोड़े की मजार बताते हैं, उस पर खंजर शहीद लिखा है. वहां 8-10 लोग तरह-तरह की माला लेकर खड़े रहते हैं. रिक्शे से जाते हुए लोग रिक्शा धीमा करवाकर उन्हें 2, 5, 10 रुपए दे देते हैं. वो लोग उनकी तरफ से मजार पर माला उछाल देते हैं. माला बेचने और फेंकने वाले नहीं जानते कि वो मजार किसकी है. वो एक दुकान में एक बुजुर्ग की ओर इशारा करके उनसे पूछने को कहते हैं. बुजुर्ग बस इतना कहते हैं कि गाजी के कोई साथी थे.
मजार से सटकर रामगोपाल यादव (मुलायम के भाई और अखिलेख के चाचा नहीं) बैठे हैं. उनके सामने चूना पत्थर का छोटा सा ढेर है, जिसे वो बेच रहे हैं. वो बताते हैं कि किसी भी सरकार की किसी भी स्कीम का कोई फायदा उन्हें नहीं मिल रहा है. उनसे बात करते हुए एक और बात हाईलाइट होती है, जिससे सरकारें अनजान हैं या अनजान रहना चाहती हैं. उनके गांव का नाम गोबरहा है, जो रानीपुर थाने के पास पड़ता है, लेकिन वो उस गांव के एक पुरवे अहिरनपुरवा में रहते हैं.
जो लोग गांव की व्यवस्था नहीं जानते, उनकी जानकारी के लिए बता दें कि एक मुख्य गांव होता है. उस गांव की सीमा में ही, लेकिन मुख्य गांव से दूर कुछ-कुछ घरों की नई-पुरानी बस्तियां होती हैं. अक्सर उन्हें किसी पुरवा के नाम से जाना जाता है. चूंकि मुख्य गांव में जनसंख्या ज्यादा होती है, वहां के प्रभावी लोग होते हैं, इसलिए सड़क-बिजली मुख्य गांव तक पहुंच जाती है, लेकिन उन पुरवों तक नहीं. एक गांव तक बिजली पहुंचाकर सरकार ये गिन लेती है कि उस गांव में बिजली पहुंच गई, जबकि उसके 5-10 पुरवों में बिजली नहीं पहुंची होती है. गोबरहा गांव में बिजली है, लेकिन अहिरनपुरवा में नहीं.
शहर में थोड़ा-बहुत काम दिखता है, लेकिन वो वैसा नहीं है, जैसा वकार अहमद शाह जैसे सपा के बड़े नेता के 5 बार से विधायक होने पर उम्मीद की जाती है. पत्रकार बताते हैं कि मुस्लिम होने के नाते सपा के मुस्लिम चेहरे होने की होड़ में वो आजम खान से पिछड़ गए और उनकी ठनी रहती है. आजम खान के पास शहरी विकास मंत्रालय था, तो इस बात का असर पड़ना ही था. लेकिन काम हुआ या नहीं हुआ, ये अलग-अलग समर्थक अपने नजरिए से बताते हैं.
रोडवेज के सामने 14 साल का लड़का एजाज चाय की साफ-सुथरी, अच्छी और फैंसी दुकान चलाता है. वो ड्राईफ्रूट चाय से लेकर न जाने कौन-कौन सी चाय देता है. वो अखिलेश की तारीफ करता है, अखिलेख के काम में मेट्रो गिनाता है, जिसे उसने देखा नहीं. उसके मामू बहराइच में हुए काम के बारे में पूछने पर पीछे की तरफ इशारा कर देते हैं. वहां रोडवेज की छत पर लोहे का जाल जैसा बन रहा है, जिस पर शायद टीन की छत पड़ेगी. लेकिन भाजपा समर्थक घसियारीपुरे का जिक्र करते हैं.
घसियारीपुरा बहराइच का वो इलाका है, जहां शायद शहर की सबसे पहली प्लॉटिंग की गई थी. वहां के रास्ते पर हमेशा पानी भरा रहता है. ये सीवेज की दिक्कत तो है ही. लोग कहते हैं कि ये दिक्कत एक तालाब के पटने की वजह से बढ़ गई है. लोगों का आरोप है कि संघारन मंदिर के बगल में तालाब को अवैध तरीके से पाटकर कब्जा कर लिया गया. कब्जा करने वाले को वो शिवपाल यादव का दूर का रिश्तेदार बताते हैं.
बहरहाल, बहराइच सदर से रूबाब सईदा का हारना काफी मुश्किल है. इसके दो-तीन बड़े कारण हैं. बहराइच सदर में मुस्लिम वोटरों की संख्या काफी है. बसपा से अजीत प्रताप सिंह हैं और भाजपा से अनुपमा जायसवाल. इसके अलावा वकार अहमद शाह कट्टर मुस्लिम छवि वाले नेता नहीं रहे, तो बहुत से हिंदू, खासकर सपा से जुड़े लोग, उन्हें आसानी से वोट करते रहे हैं, करेंगे.
बहराइच की बल्हा सीट जिले का सीमांत इलाका है और देश का भी. बहराइच मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर ये जगह जंगल का इलाका है और एक तरफ नेपाल बॉर्डर भी है. बल्हा से 2012 में भाजपा की सावित्रीबाई फुले जीतीं, 2014 में सांसद बन गईं और विधानसभा के उपचुनाव में सपा के वंशीधर बौद्ध जीते, जिन्हें अखिलेश यादव ने मंत्री भी बनाया.
कतर्निया के घने जंगल में करीब 40-50 किलोमीटर घुसने के बाद नई बस्ती टेड़िया पड़ता है. यहां की भानमती को राष्ट्रपति से पुरस्कार मिला हुआ है. बहुत तेज-तर्रार महिला हैं. किसी से भी सवाल करो, जवाब वही देती हैं. भानमती बताती हैं कि उज्ज्वला योजना में उनसे पैसे लेने की हिम्मत तो किसी की नहीं हुई, लेकिन बाकी लोगों से 1000-2000 रुपए तक मांगे जाते हैं.
इस गांव की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि ये जंगल में पड़ता है और राजस्व भूमि नहीं है, तो पक्का मकान नहीं बनवा सकते और किसी भी योजना का लाभ लेने में दिक्कत आती है. बाघ का खतरा हर तरफ है और मकान मिट्टी के, छप्पर पड़े हुए.
बाघ से बड़ा खतरा वन विभाग के कर्मचारी हैं. जंगल में रहने वाले लोग अपनी जरूरतभर का सामान जंगल से नहीं, तो कहां से लेंगे? कुछ देर पहले एक आदमी एक पेड़ से कुछ लकड़ी तोड़ रहा था. वन विभाग की गाड़ी आते देख वो डर के मारे किनारे हट गया. वन विभाग वाले उसकी साइकिल लेकर चले गए. वो आदमी कहता है कि वो उस वक्त अकेला था, अगर 4-5 लोग होते, तो ऐसा नहीं होता.
उसी गांव के वंशीधर बौद्ध हैं. विधायक और मंत्री. हम उनके घर पहुंचे, तो न वो थे और न ही उनकी पत्नी. कुछ लोग उनके दुआरे पर बनी बैठक में बैठे टीवी देख रहे थे. हम पूछ ही रहे थे, तब तक मंत्री जी की पत्नी राजवती घास का बड़ा सा गट्ठर सिर पर लादकर लाते दिखीं. वो घास काटने गई थीं. कहती हैं कि काम तो करना ही पड़ेगा. घर में कुछ भैंसें हैं, तो ये घास उनके लिए है. उनके घर के दरवाजे के इर्द-गिर्द ईटों की थोड़ी दीवार सी थी. हालांकि, उसके पीछे छप्पर ही थे और ईंटों की छत जैसा कुछ नहीं था.
जब तमाम मंत्रियों के घर आलीशान महलों जैसे दिखते हों, तो ये पूछने में ग्लानि हो रही थी, लेकिन चूंकि वहां गांव में किसी को पक्का घर बनाने की इजाजत नहीं है, किसी के घर में ईंटों का इस्तेमाल नहीं है, इसलिए उनसे इस बारे में पूछना पड़ा. उन्होंने बताया कि कुछ ईंटें बस ऐसे ही जोड़ दी गई हैं. हम राजवती जी से उनके घर में बात करते हैं, वहां मौजूद लोगों से बात करते हैं. बातचीत खत्म ही होने वाली थी कि मंत्री जी आ गए. वो तुरंत ही आकर लोगों के बीच खड़े हमारी बात सुन रहे थे.
वंशीधर कभी पंक्चर बनाने का काम किया करते थे. खेतों में मजदूरी भी की. धीरे-धीरे राजनीति में आ गए. जिला पंचायत सदस्य रहे और उपचुनाव में विधायकी जीते, मंत्री बन गए. एक बारिश में मिट्टी से बना उनके घर का एक हिस्सा गिर गया था. मंत्री जी उस वक्त यहां नहीं थे. उनकी पत्नी और बच्चों ने उसका मलबा हटाया. अब वहां दीवार नहीं है, टीन की शेड है.
पता चला कि मंत्री जी ने बहराइच या लखनऊ कहीं और घर नहीं बनवाया है, लेकिन वो बच्चों की सुविधा के लिए बनवाना चाहते हैं. हमने पूछा कि पत्नी को लखनऊ में मिले आवास में क्यों नहीं रखते, तो मंत्री जी ने बताया कि वहां उनकी तबीयत खराब हो जाती है. उनकी पत्नी जवाब देती हैं, ‘हुआं नीक नाय लागत है. हम सभै धूर-माटी मा काम करै वालै आदमी होई.’
हमने मंत्री जी की सादगी के बारे में काफी सुन रखा था. बातचीत खत्म होने के बाद उन्होंने चाय पीने के लिए कहा. पता चला कि दूध नहीं है. ये बात हुई कि तुरंत ताजा दुह लिया जाए. फिर पता चला कि पड़वा (भैंस का बच्चा) ने दूध पी लिया. मंत्री जी दौड़े-दौड़े गए और खुद दुह कर देखने लगे. लेकिन पड़वा दूध पी चुका था. मंत्री जी ने बहुत अफसोस जाहिर किया.
हालांकि, वंशीधर बौद्ध के जीतने के चांस लोग कम बताते हैं. यहां सपा इसके पहले कभी नहीं जीती थी. उपचुनाव में बसपा कैंडीडेट नहीं उतारती है, इसका फायदा उन्हें मिला था. इलाके के भाजपा समर्थक दुकानदार बताते हैं कि उस वक्त वंशीधर को जिताने में राज्य के कई मंत्री जुटे थे. लड़ाई भाजपा के अक्षयवर लाल और बसपा की किरण भारती के बीच मानी जा रही है.
बहराइच में कोई खास उद्योग-धंधा नहीं है. ज्यादातर लोग खेती ही करते हैं. बहराइच के फखरपुर में एक बाबा हुआ करते थे. बाबा की गोशाला थी. बाबा नहीं रहे. गोशाला की देख-रेख बंद हो गई. सैकड़ों गाएं सड़क पर आ गईं. वो गाएं एक साथ रहती हैं. बहुत बड़े इलाके में घूमती हैं. जिधर से निकलती हैं, उधर के खेत तबाह. किसान बर्बाद. किसानों ने बहुत और प्रशासन ने थोड़ी कोशिश की कि उन्हें पकड़कर कहीं भिजवाया जा सके, लेकिन कुछ न हो पाया. उस झुंड में कुछ सांड भी हैं और वो झुंड बढ़ता ही जा रहा है.

News Posted on: 24-02-2017
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