हम जानते हैं कि ईश्वरीय दरबार से शैतान के निकाले जाने का मुख्य कारण अहंकार ही था। इब्लीस फ़रिश्तों में नहीं था किन्तु ईश्वरीय आदेश के पालन के कारण वह उस स्थान पर पहुंच गया था जो फ़रिशतों से विशेष था किन्तु उसने जो स्थान प्राप्त किया था उसे अहंकार के कारण
अहंकार उन बुराईयों में से है जो मनुष्य में पायी जाती है और इस्लाम धर्म की शिक्षाओं और इस्लामी संस्कृति में इसकी बहुत भर्त्सना की गयी है। पवित्र क़ुरआन की बहुत सी आयतों और पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के बहुत से कथनों में बयान किया गया है कि यह विशेषता नैतिक आपदाओं में से है और मनुष्य के नैतिक शिखर पर पहुंचने में बड़ी रुकावटें उत्पन्न करती है। इस प्रकार अहंकार मनुष्य के दुर्भाग्य का सबसे बड़ा स्रोत समझा जाता है। अहंकार ही मनुष्य को ईश्वर से दूर और शैतान से निकट करता है। यही मनुष्य की भारी आत्मिक व अध्यात्मिक हानियों का कारण बनता है। अहंकारी लोग समाज में सदैव घृणा के पात्र होते हैं और अनुचित व असीमित चाह की आशाओं के कारण सामाजिक अलग थलग का शिकार होते हैं। अहंकार, द्वेष व ईर्ष्या जैसी बुराईयों की चाभी है और इसी के चलते मनुष्य अपमानित भी होता है।

पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों में अहंकार शब्द का व्यापक प्रयोग किया गया है। इस शब्द की परिभाषा के बारे में कहा गया है कि हर वस्तु जो मनुष्य को धोखा देती है और निश्चेतना में ढकेल देती है चाहे वह माल हो या स्थान, ज्ञान हो या प्रसिद्धि, उसे अहंकार कहा जाता है।

इस्लाम धर्म के प्रसिद्ध विद्वान मुहम्मद ग़ज़ाली अपनी पुस्तक एहयाये उलूमिद्दीन में अहंकार के बारे में इस प्रकार कहते हैं कि उस चीज़ से दिल लगाना जो मनुष्य की भ्रष्ट आंतरिक इच्छाओं व भौतिकतावादी प्रवृत्ति के अनुरूप हो या मनुष्य की ग़लती या शैतानी धोखे के कारण उत्पन्न हुई हो।

हम जानते हैं कि ईश्वरीय दरबार से शैतान के निकाले जाने का मुख्य कारण अहंकार ही था। इब्लीस फ़रिश्तों में नहीं था किन्तु ईश्वरीय आदेश के पालन के कारण वह उस स्थान पर पहुंच गया था जो फ़रिशतों से विशेष था किन्तु उसने जो स्थान प्राप्त किया था उसे अहंकार के कारण खो दिया। उसके बाद वह अपने किए पर अहंकार के कारण इतना अड़ गया कि न केवल उसने प्रायश्चित नहीं किया बल्कि उसने एक उकसाने वाले के रूप में समस्त अपराधियों और पापियों के अपराध में बराबर का भाग लेने का निर्णय किया। इस प्रकार से मनुष्य की सृष्टि के आरंभ में अहंकार की पहली चिंगारी शैतान के चेहरे पर देखी गयी।

जब ईश्वर ने हज़रत आदम की रचना की और सृष्टि में उनके उच्च व श्रेष्ठ स्थान के दृष्टिगत समस्त फ़रिश्तों से आदम का सज्दा करने को कहा तो इब्लीस ने इन्कार कर दिया। ईश्वर ने उससे कहा कि किस चीज़ ने तुझे आदम के सज्दे से रोक दिया। शैतान ने अहंकारी लहजे में कहा कि मैं उससे श्रेष्ठ हूं तू ने मुझे आग से पैदा किया है जबकि उसे गीली मिट्टी से और आग मिट्टी से श्रेष्ठ होती है।

जी हां अहंकार और आत्ममुग्धता शैतान की राह में रुकावट बन गयी कि वह अपने कल्याण के मार्ग को कि जो ईश्वर के स्पष्ट आदेशों का अनुसरण था, देख सके और वह कल्याण के मार्ग से दूर होता गया और अंततः अवज्ञा की गहरी खाई में जा गिरा और सदैव के लिए धिक्कार का पात्र बन गया। इब्लीस अहंकार के कारण हज़रत आदम की श्रेष्ठता को सहन न कर सका और उसके अनुसरण की श्रेष्ठता पापों के अंधकार में डूब गयी और सदैव के लिए ईश्वर के सीधे रास्ते से भटक गया।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के भाषण क्रमांक 192 में इस प्रक्रिया की ओर संकेत करते हैं कि ईश्वर ने इब्लीस से जो बर्ताव किया उससे पाठ सीखो, शैतान की छह हज़ार वर्ष की उपासनाएं, कर्म और प्रयास एक क्षण के अहंकार के कारण मिट्टी में मिल गये, इस प्रकार से इब्लीस के बाद कौन है जो अहंकार करने के संबंध में ईश्वर के प्रकोप से सुरक्षित रहे। नहीं कदापि संभव नहीं है कि ईश्वर किसी को उस कार्य के लिए स्वर्ग में भेजे जिस कार्य के चलते एक फ़रिश्ते को स्वर्ग से निकाला।

पवित्र क़ुरआन की विभिन्न आयतों में अहंकार से संघर्ष करने की बात कही गयी है या दूसरे शब्दों में ईमान वालों को अहंकार से रोका गया है। ईश्वर इस कार्य के लिए पूर्व की जातियों की उद्दंडताओं का वर्णन करता है क्योंकि अतीत की विभिन्न जातियों द्वारा ईश्वरीय दूतों के निमंत्रण को स्वीकार न करने का मुख्य कारण उनके भीतर अहंकार जैसी बुराई का पाया जाना था।

ईश्वर पवित्र क़ुरआन में अपने सबसे बड़े दूत हज़रत नूह की घटना की ओर संकेत करता है कि उनकी जाति के लोगों ने अहंकार के कारण उनके निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया था, हज़रत नूह की जाति के काफ़िर सरदारों के सामने जब हज़रत नूह ने ईश्वरीय संदेश रखा तो उन्होंने कहा हम तो तुम को अपना ही जैसा एक मनुष्य समझ रहे हैं और तुम्हारा अनुसरण करने वालों को देखते हैं कि वह हमारे निचले वर्ग के साधारण लोग हैं, हम तुम में अपने ऊपर कोई विशिष्टता नहीं देखते बल्कि तुम्हें झूठा समझते हैं। हज़रत नूह की अहंकारी जाति ने चमत्कारों के माध्यम से उनकी सच्चाई को देखा किन्तु अहंकार के कारण उन्होंने उद्दंडता की। पवित्र क़ुरआन इसी प्रकार हज़रत शुएब की जाति का वर्णन करता है कि शुएब की जाति के अहंकार ने उन्हें ईश्वरीय निमंत्रण के आगे नतमस्तक होने की अनुमति न दी। पवित्र क़ुरआन में फ़िरऔन की घटना अहंकार की बुराई का एक अन्य रूप है। फ़िरऔन और नमरूद जैसे अहंकारी लोग अपने अहंकार के कारण इस बात को तनिक भी महत्त्व नहीं देते कि किस प्रकार से लोगों से बातचीत की जाए या किस प्रकार लोगों से बर्ताव किया जाए और इतिहास में मिलता है कि इस तरह के लोग ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें करते थे कि उनके निकटवर्ती तक मन ही मन में उन पर हंसते थे। पूर्ण विश्वास के साथ यह कहा जा सकता है कि यह स्थिति ईश्वरीय शिक्षाओं को समझने और जीवन की वास्तविक पहचान की राह में सबसे बड़ी रुकावट बन जाती है।

पवित्र क़ुरआन ने बनी इस्राईल और हज़रत सालेह की जाति के लोगों का भी वर्णन किया है कि जिन्होंने अहंकार और उद्दंडता के कारण बहाने बनाए और सत्य के निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया। इतिहास में वर्णित इन घटनाओं के अध्ययन से पता चलता है कि जब से हज़रत आदम ने इस धरती पर क़दम रखा है तब से आज तक समस्त बुराइयों, भ्रष्टाचारों, पथभ्रष्टताओं, द्वेष और ईर्ष्या की मुख्य जड़ अहंकार ही रहा है।

अहंकार इतना अधिक बुरा है कि पवित्र क़ुरआन में ईश्वर सीधे अपने पैग़म्बर को संबोधित करते हुए सूरए इसरा की आयत क्रमांक 37 में कहता है कि धरती पर अकड़ कर न चलना कि न तो आप ज़मीन को फाड़ सकते हैं और न सिर उठाकर पवर्तों की ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं। ईश्वर इस वास्तविकता की ओर संकेत करना चाहता है कि अहंकारी व्यक्ति धरती पर चलते समय बहुत ही ज़ोर ज़ोर से अपने क़दमों को पटख़ते हैं ताकि लोगों को अपने आने जाने से सचेत कर सकें। इसी प्रकार गर्दन को अकड़ाकर आकाश की ओर करते हैं ताकि अपने व्यवहार से अपनी श्रेष्ठता लोगों को दिखाएं। इस प्रकार से पवित्र क़ुरआन की दृष्टि में अहंकार यदि थोड़ा सा भी हो तब भी निंदनीय व बुरा है। मनुष्य के भीतरी गुण जैसे भी हों, कर्मों के माध्यम से सामने आते हैं और इसीलिए क़ुरआन के आदेशानुसार इस के छोटे छोटे चिन्ह के विरुद्ध संघर्ष भी करना चाहिए।

अब हम आपको यह बताने जा रहे हैं कि किस कारण लोगों में अहंकार की बुराई जन्म लेती है। जैसा कि आप जानते हैं कि मनुष्य अपनी भीतरी क्षमताओं के दृष्टिगत एक समान नहीं है और उसमें विभिन्न प्रकार की क्षमताएं व योग्यताएं पायी जाती हैं। कुछ लोग थोड़ी सी भौतिक विशिष्टता प्राप्त करके या निम्न अध्यात्मिक स्थान प्राप्त करके इतने अहंकारी हो जाते हैं कि मानो परिपूर्णता व ज्ञान व परिज्ञान के शिखर को पार कर लिया हो।

कभी ऐसा होता है कि मनुष्य जो ज्ञान उसने प्राप्त किया है उसके कारण अहंकार और आत्ममुगध्ता का शिकार हो जाता है और स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। इस प्रकार से यह अहंकार उस ज्ञानी का अहंकार होता है जो अपने ज्ञान के कारण अहंकारी हो जाता है और स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। कभी कभी माल व दौलत मनुष्य को अहंकारी बना देती है जैसा कि क़ारून अधिक माल - दौलत के कारण अहंकारी हो गया था।

कुछ लोग अपने कुटुंब को लेकर या किसी विशेष वर्ग से संबंध होने के कारण अहंकार करने लगते हैं। ऐसे लोग हर मामले में स्वयं को सत्य के मार्ग पर समझते हैं और लोगों को बहुत घटिया व तुच्छ दृष्टि से देखते हैं और चाहते हैं कि सब लोग उन्हें झुककर सलाम करें और उनका सम्मान करें और उनकी सेवा में रहें। कभी कभी होता है कि मनुष्य अपनी उपासना और सदकर्म के कारण अहंकार का शिकार हो जाता है और अपनी उपासनाओं को दिखावे के लिए लोगों के सामने पेश करता है। ईश्वर की कृपा और उसके उपकार को भूल जाता है और व्यवहारिक रूप से अपने स्थान को अन्य लोगों से श्रेष्ठ समझने लगता है। शैतानी बहकावा, भ्रष्ट आंतरिक इच्छाओं का अनुसरण, बदले की भावना, संसार से प्रेम और अधिक से अधिक प्राप्त करने की चाहत, अहंकार के अन्य कारक हैं।

 

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अहंकार और उससे होने वाले नुक़सान

हम जानते हैं कि ईश्वरीय दरबार से शैतान के निकाले जाने का मुख्य कारण अहंकार ही था। इब्लीस फ़रिश्तों में नहीं था किन्तु ईश्वरीय आदेश के पालन के कारण वह उस स्थान पर पहुंच गया था जो फ़रिशतों से विशेष था किन्तु उसने जो स्थान प्राप्त किया था उसे अहंकार के कारण
अहंकार उन बुराईयों में से है जो मनुष्य में पायी जाती है और इस्लाम धर्म की शिक्षाओं और इस्लामी संस्कृति में इसकी बहुत भर्त्सना की गयी है। पवित्र क़ुरआन की बहुत सी आयतों और पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के बहुत से कथनों में बयान किया गया है कि यह विशेषता नैतिक आपदाओं में से है और मनुष्य के नैतिक शिखर पर पहुंचने में बड़ी रुकावटें उत्पन्न करती है। इस प्रकार अहंकार मनुष्य के दुर्भाग्य का सबसे बड़ा स्रोत समझा जाता है। अहंकार ही मनुष्य को ईश्वर से दूर और शैतान से निकट करता है। यही मनुष्य की भारी आत्मिक व अध्यात्मिक हानियों का कारण बनता है। अहंकारी लोग समाज में सदैव घृणा के पात्र होते हैं और अनुचित व असीमित चाह की आशाओं के कारण सामाजिक अलग थलग का शिकार होते हैं। अहंकार, द्वेष व ईर्ष्या जैसी बुराईयों की चाभी है और इसी के चलते मनुष्य अपमानित भी होता है।

पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों के कथनों में अहंकार शब्द का व्यापक प्रयोग किया गया है। इस शब्द की परिभाषा के बारे में कहा गया है कि हर वस्तु जो मनुष्य को धोखा देती है और निश्चेतना में ढकेल देती है चाहे वह माल हो या स्थान, ज्ञान हो या प्रसिद्धि, उसे अहंकार कहा जाता है।

इस्लाम धर्म के प्रसिद्ध विद्वान मुहम्मद ग़ज़ाली अपनी पुस्तक एहयाये उलूमिद्दीन में अहंकार के बारे में इस प्रकार कहते हैं कि उस चीज़ से दिल लगाना जो मनुष्य की भ्रष्ट आंतरिक इच्छाओं व भौतिकतावादी प्रवृत्ति के अनुरूप हो या मनुष्य की ग़लती या शैतानी धोखे के कारण उत्पन्न हुई हो।

हम जानते हैं कि ईश्वरीय दरबार से शैतान के निकाले जाने का मुख्य कारण अहंकार ही था। इब्लीस फ़रिश्तों में नहीं था किन्तु ईश्वरीय आदेश के पालन के कारण वह उस स्थान पर पहुंच गया था जो फ़रिशतों से विशेष था किन्तु उसने जो स्थान प्राप्त किया था उसे अहंकार के कारण खो दिया। उसके बाद वह अपने किए पर अहंकार के कारण इतना अड़ गया कि न केवल उसने प्रायश्चित नहीं किया बल्कि उसने एक उकसाने वाले के रूप में समस्त अपराधियों और पापियों के अपराध में बराबर का भाग लेने का निर्णय किया। इस प्रकार से मनुष्य की सृष्टि के आरंभ में अहंकार की पहली चिंगारी शैतान के चेहरे पर देखी गयी।

जब ईश्वर ने हज़रत आदम की रचना की और सृष्टि में उनके उच्च व श्रेष्ठ स्थान के दृष्टिगत समस्त फ़रिश्तों से आदम का सज्दा करने को कहा तो इब्लीस ने इन्कार कर दिया। ईश्वर ने उससे कहा कि किस चीज़ ने तुझे आदम के सज्दे से रोक दिया। शैतान ने अहंकारी लहजे में कहा कि मैं उससे श्रेष्ठ हूं तू ने मुझे आग से पैदा किया है जबकि उसे गीली मिट्टी से और आग मिट्टी से श्रेष्ठ होती है।

जी हां अहंकार और आत्ममुग्धता शैतान की राह में रुकावट बन गयी कि वह अपने कल्याण के मार्ग को कि जो ईश्वर के स्पष्ट आदेशों का अनुसरण था, देख सके और वह कल्याण के मार्ग से दूर होता गया और अंततः अवज्ञा की गहरी खाई में जा गिरा और सदैव के लिए धिक्कार का पात्र बन गया। इब्लीस अहंकार के कारण हज़रत आदम की श्रेष्ठता को सहन न कर सका और उसके अनुसरण की श्रेष्ठता पापों के अंधकार में डूब गयी और सदैव के लिए ईश्वर के सीधे रास्ते से भटक गया।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के भाषण क्रमांक 192 में इस प्रक्रिया की ओर संकेत करते हैं कि ईश्वर ने इब्लीस से जो बर्ताव किया उससे पाठ सीखो, शैतान की छह हज़ार वर्ष की उपासनाएं, कर्म और प्रयास एक क्षण के अहंकार के कारण मिट्टी में मिल गये, इस प्रकार से इब्लीस के बाद कौन है जो अहंकार करने के संबंध में ईश्वर के प्रकोप से सुरक्षित रहे। नहीं कदापि संभव नहीं है कि ईश्वर किसी को उस कार्य के लिए स्वर्ग में भेजे जिस कार्य के चलते एक फ़रिश्ते को स्वर्ग से निकाला।

पवित्र क़ुरआन की विभिन्न आयतों में अहंकार से संघर्ष करने की बात कही गयी है या दूसरे शब्दों में ईमान वालों को अहंकार से रोका गया है। ईश्वर इस कार्य के लिए पूर्व की जातियों की उद्दंडताओं का वर्णन करता है क्योंकि अतीत की विभिन्न जातियों द्वारा ईश्वरीय दूतों के निमंत्रण को स्वीकार न करने का मुख्य कारण उनके भीतर अहंकार जैसी बुराई का पाया जाना था।

ईश्वर पवित्र क़ुरआन में अपने सबसे बड़े दूत हज़रत नूह की घटना की ओर संकेत करता है कि उनकी जाति के लोगों ने अहंकार के कारण उनके निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया था, हज़रत नूह की जाति के काफ़िर सरदारों के सामने जब हज़रत नूह ने ईश्वरीय संदेश रखा तो उन्होंने कहा हम तो तुम को अपना ही जैसा एक मनुष्य समझ रहे हैं और तुम्हारा अनुसरण करने वालों को देखते हैं कि वह हमारे निचले वर्ग के साधारण लोग हैं, हम तुम में अपने ऊपर कोई विशिष्टता नहीं देखते बल्कि तुम्हें झूठा समझते हैं। हज़रत नूह की अहंकारी जाति ने चमत्कारों के माध्यम से उनकी सच्चाई को देखा किन्तु अहंकार के कारण उन्होंने उद्दंडता की। पवित्र क़ुरआन इसी प्रकार हज़रत शुएब की जाति का वर्णन करता है कि शुएब की जाति के अहंकार ने उन्हें ईश्वरीय निमंत्रण के आगे नतमस्तक होने की अनुमति न दी। पवित्र क़ुरआन में फ़िरऔन की घटना अहंकार की बुराई का एक अन्य रूप है। फ़िरऔन और नमरूद जैसे अहंकारी लोग अपने अहंकार के कारण इस बात को तनिक भी महत्त्व नहीं देते कि किस प्रकार से लोगों से बातचीत की जाए या किस प्रकार लोगों से बर्ताव किया जाए और इतिहास में मिलता है कि इस तरह के लोग ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें करते थे कि उनके निकटवर्ती तक मन ही मन में उन पर हंसते थे। पूर्ण विश्वास के साथ यह कहा जा सकता है कि यह स्थिति ईश्वरीय शिक्षाओं को समझने और जीवन की वास्तविक पहचान की राह में सबसे बड़ी रुकावट बन जाती है।

पवित्र क़ुरआन ने बनी इस्राईल और हज़रत सालेह की जाति के लोगों का भी वर्णन किया है कि जिन्होंने अहंकार और उद्दंडता के कारण बहाने बनाए और सत्य के निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया। इतिहास में वर्णित इन घटनाओं के अध्ययन से पता चलता है कि जब से हज़रत आदम ने इस धरती पर क़दम रखा है तब से आज तक समस्त बुराइयों, भ्रष्टाचारों, पथभ्रष्टताओं, द्वेष और ईर्ष्या की मुख्य जड़ अहंकार ही रहा है।

अहंकार इतना अधिक बुरा है कि पवित्र क़ुरआन में ईश्वर सीधे अपने पैग़म्बर को संबोधित करते हुए सूरए इसरा की आयत क्रमांक 37 में कहता है कि धरती पर अकड़ कर न चलना कि न तो आप ज़मीन को फाड़ सकते हैं और न सिर उठाकर पवर्तों की ऊंचाइयों तक पहुंच सकते हैं। ईश्वर इस वास्तविकता की ओर संकेत करना चाहता है कि अहंकारी व्यक्ति धरती पर चलते समय बहुत ही ज़ोर ज़ोर से अपने क़दमों को पटख़ते हैं ताकि लोगों को अपने आने जाने से सचेत कर सकें। इसी प्रकार गर्दन को अकड़ाकर आकाश की ओर करते हैं ताकि अपने व्यवहार से अपनी श्रेष्ठता लोगों को दिखाएं। इस प्रकार से पवित्र क़ुरआन की दृष्टि में अहंकार यदि थोड़ा सा भी हो तब भी निंदनीय व बुरा है। मनुष्य के भीतरी गुण जैसे भी हों, कर्मों के माध्यम से सामने आते हैं और इसीलिए क़ुरआन के आदेशानुसार इस के छोटे छोटे चिन्ह के विरुद्ध संघर्ष भी करना चाहिए।

अब हम आपको यह बताने जा रहे हैं कि किस कारण लोगों में अहंकार की बुराई जन्म लेती है। जैसा कि आप जानते हैं कि मनुष्य अपनी भीतरी क्षमताओं के दृष्टिगत एक समान नहीं है और उसमें विभिन्न प्रकार की क्षमताएं व योग्यताएं पायी जाती हैं। कुछ लोग थोड़ी सी भौतिक विशिष्टता प्राप्त करके या निम्न अध्यात्मिक स्थान प्राप्त करके इतने अहंकारी हो जाते हैं कि मानो परिपूर्णता व ज्ञान व परिज्ञान के शिखर को पार कर लिया हो।

कभी ऐसा होता है कि मनुष्य जो ज्ञान उसने प्राप्त किया है उसके कारण अहंकार और आत्ममुगध्ता का शिकार हो जाता है और स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। इस प्रकार से यह अहंकार उस ज्ञानी का अहंकार होता है जो अपने ज्ञान के कारण अहंकारी हो जाता है और स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। कभी कभी माल व दौलत मनुष्य को अहंकारी बना देती है जैसा कि क़ारून अधिक माल - दौलत के कारण अहंकारी हो गया था।

कुछ लोग अपने कुटुंब को लेकर या किसी विशेष वर्ग से संबंध होने के कारण अहंकार करने लगते हैं। ऐसे लोग हर मामले में स्वयं को सत्य के मार्ग पर समझते हैं और लोगों को बहुत घटिया व तुच्छ दृष्टि से देखते हैं और चाहते हैं कि सब लोग उन्हें झुककर सलाम करें और उनका सम्मान करें और उनकी सेवा में रहें। कभी कभी होता है कि मनुष्य अपनी उपासना और सदकर्म के कारण अहंकार का शिकार हो जाता है और अपनी उपासनाओं को दिखावे के लिए लोगों के सामने पेश करता है। ईश्वर की कृपा और उसके उपकार को भूल जाता है और व्यवहारिक रूप से अपने स्थान को अन्य लोगों से श्रेष्ठ समझने लगता है। शैतानी बहकावा, भ्रष्ट आंतरिक इच्छाओं का अनुसरण, बदले की भावना, संसार से प्रेम और अधिक से अधिक प्राप्त करने की चाहत, अहंकार के अन्य कारक हैं।

 

News Posted on: 11-02-2017
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